Monday, 20 June 2016

इनके बिना आपकी ईद और रोजा दोनों बेकार- कहीं मजदूर कहीं मजबूर

याद रखना अगर इनकी ईद नही हुई तो तुम्हारी भी ईद नही हो सकती अपने अगल बगल पड़ोस में तलाश करो बहुत से ऐसे घर मिल जायेगे जो खुद्दारी से मर जाना पसंद करेगे पर हाथ नही फैलायेगें उनका भी ख्याल करे आका ने पड़ोसी का ख्याल रखने को कहा है प्लीज़ प्लीज़ हेल्प करे और इंसानियत को ज़िंदा रक्खे इंसान बने यहूदी न बने
-शमीम अंसारी


रमजान यह गरीबो और बेसहाराओ को सहारा देने का नाम है. रमजान में रमजान के ईद को ईद-उल-फ़ित्र कहा जाता है. जो लोग गरीब और बेसहारा है उनको अनाज दान देने की प्रक्रिया को "फ़ित्र" कहा जाता है. और इस महीने में हर मुसलमान ज्यादा से ज्यादा खैर-खैरात करता है. रोजे और इबादत करता है. वैसे सदका इस्लाम में हर उस इंसान पर 12 महीने फर्ज है जो मालदार हो. बावजूद इसके रमजान में मुसलमान लोग ज्यादा से ज्यादा खैर खैरात करते है. लेकिन.......


कुछ लोग गरीब और बेसहारा होकर भी खुद्दार होने की वजह से अपनी पारेशानिया किसीसे शेयर नहीं करते और ना ही किसीसे कुछ मांगते है. लेकिन मुसलमान कसरत से ऐसे लोगो को भी खोज निकालते है. पर अक्सर ऐसे लोग छुट भी जाते है. इसीलिए मुसलमानों को चाहिए की अपने आस-पास कोई ऐसा छूट ना जाए इसका ख़याल रखना चाहिए. और कोई भी ईद से महरूम ना रहे इसका ख़याल रखना चाहिए. अक्सर खुद्दार लोग किसीको अपना हाल नहीं बताते लेकिन उनके दिलो में भी ईद मनाने की हजारो ख्वाहिशे दबी होती है.
-संपादक


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