Friday, 2 September 2016

सीडी काण्ड, मासूमो पर बलात्कार और हात्या, मीडिया का रुख किधर ?

एक सीडी में दो व्यस्क लोग अपनी अपनी मर्जी से सेक्स कर रहे हैं सेक्स करने वालों में ना तो महिला ने कहीं कोई रिपोर्ट दर्ज करवाई है न पुरुष नें और न ही किसी तीसरे पक्ष नें कहीं कोई शिकायत की है उसके बावजूद मेनस्ट्रीम मीडिया में उस सेक्स स्कैंडल की भरपूर चर्चा है । इसके विपरीत तवाड़ू में दो महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार दो लोगों की जघन्य हत्या तथा परिवार के अन्य सदस्यों की निर्मम पिटाई के बावजूद कहीं कोई चर्चा नहीं है । सीडी में दिख रहा पुरुष चर्चा का विषय है कोई उसे पतित बता रहा है तो कोई पीड़ित कहकर सहानुभूति जता रहा है, तो कुछ लोग इसे नैतिकता का पतन करार दे रहे हैं । दूसरी तरफ किसी चैनल के पास किसी पत्रकार के पास इतना समय नहीं है कि वह तवाड़ू की घटना का जिक्र भर करदे, किसी लेखक के पास इतना समय नहीं है कि 2 शब्द तवाड़ू के हताहतों के प्रति सहानुभूति में लिख दे । 


जो लोग दिल्ली के मंत्री के अपराध का आकलन कर रहे हैं उनके पास इतना भी समय नहीं है खेत वालों के अपराधियों की निंदा भर कर दें , उनके पास इतना समय नहीं है कि वह इस बात पर सवाल उठा दें की दो दो हत्याएं होने के बावजूद धारा 302 लगाने में आनाकानी क्यों की गई ? उनके पास इतना समय नहीं है कि वह पता लगाएं कि वह कौन मंत्री है जो इस मामले को दबाना चाहता है ? आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है ऐसा इसलिए हो रहा है क्यूँ कि तवाड़ू में जो पीड़ित परिवार है वह मुस्लिम है तलवारों में जो पीड़ित परिवार है उनके नाम अरबी अथवा उर्दू में हैं, तवाड़ू का जो पीड़ित परिवार है वह गरीब है, और तवाड़ू के जो अपराधी हैं जो आरोपी हैं उनका संबंध तथाकथित राष्ट्रवाद से है । इसके बाद भी आप कहोगे कि मीडिया जाति देखकर कवरेज करने नहीं जाती ? भाई साहब आपके कहने भर से बात खत्म नहीं हो जाती, माना के हमारे पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं है मगर हम इतना तो समझते हैं कि आप कहाँ जाते हैं क्यों जाते हैं क्यों नहीं जाते हैं । आप हमारी आंखों में धूल नहीं झोंक सकते, हम आपका दोगला रवैया देख रहे हैं, समझ रहे हैं कि आप हिंदू राष्ट्र बनाने की राह पर चल रहे हो । आप उन्ही खबरों को तवज्जो देते हो जिसमें कोई मुसलमान आरोपी होता है, आप उन्ही खबरों को तवज्जो देते हो जिसमें आपका राजनीतिक हित होता है । 


आप उन खबरों को तवज्जो नहीं देते हो जिसमें मजलूम मुसलमान हों और वह गरीब हों, आप मानो या ना मानो मैं डंके की चोट पर कहता हूं आप जब कवरेज करते हो तो जाति और धर्म देख देख के करते हो, आप जब ख़बरें लिखते हो तो जाति और धर्म देख-देख कर लिखते हो । वरना आपकी नजर में हर अपराधी अपराधी होता, हर पीड़ित 'पीड़ित' होता । मगर नहीं जब बंदूक के पीछे मुसलमान होता है तब आप उसे आतंकवादी कहते हो और जब बंदूक के पीछे मुसलमान नहीं होता कोई और होता है तब आप उसे मानसिक रोगी कहते हो, तब आप उसे नक्सलवादी, कहते हो तब आप उसे अतिवादी कहते हो, दक्षिणपंथी कहते हो, माओवादी कहते हो, उग्रवादी कहते हो । भाई साहब और कितना पर्दा डालोगे और कितना झूठ बोलोगे ? आप मिसाल दे रहे हो कि बुलंदशहर के आरोपी 5 मुस्लिम थे भाई साहब अपराधी हो या पीड़ित उनका धर्म हो सकता है उनका धर्म कुछ भी हो सकता है मगर पत्रकारिता का सिर्फ एक ही धर्म है और वह धर्म है सच्चाई दिखाना । जब आपने बुलंदशहर की कवरेज की जब आपने बुलंदशहर की घटना पर यूपी सरकार को घेरा उस पर चर्चाएं की मुझे बहुत अच्छा लगा मैंने खुद तीन-तीन पोस्ट बुलंदशहर की घटना पर लिखे थे मगर शिकायत यह है कि आप और बाकी के लोग तवाड़ू की घटना पर खामोश क्यों हैं ?

शफी बलोच

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