Wednesday, 3 May 2017

मेरी पत्नी प्रसव पीड़ा से कराहती रही और मैं मजबूरन एनआईए के कार्यालय जाता रहा- आतिफ

आतंकवाद के नाम पर भ्रमित बता कर डि-रेडिकलाइजेशन के नाम पर एजेंसियां तैयार कर रही हैं गवाह और मुखबिर
डी-रेडिकलाइजेशन को घर वापसी कहना यूपी एटीएस की संघी जेहनियत

लखनऊ 3 मई 2017। रिहाई मंच द्वारा यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता में कानपुर के मोहम्मद आतिफ ने एजेंसियों द्वारा किए जा रहे डी-रेडिकलाइजेशन के सच को उजागर किया। 

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मोहम्मद आतिफ ने कहा कि 7 मार्च 2017 से लेकर आज तक एटीएस और एनआईए के लोग मुझे रोज-रोज तंग करते रहे हैं। पहले एटीएस अपने दफ्तर कानपुर में ले जाकर प्रताड़ित करती रही उसके बाद अपने लखनऊ हेड क्वाटर पर प्रताड़ित किया। वहां एनआईए की टीम भी आकर पूछताछ करती रही। बाद में समय-समय पर एनआईए के कार्यालय से फोन करके बुलाया जाता रहा और प्रताड़ित किया जाता रहा। दबाव बनाया जाता रहा कि मैं पकड़े गए लोगों के खिलाफ एनआईए के कहे पर बयान दूं। पूछताछ के नाम पर मुझे रेल बाजार थाने कानपुर, एटीएस मुख्यालय लखनऊ में मारा-पीटा भी गया। पुलिस वाले मेरे सर, गर्दन पर घूंसा मारते थे और पैरों पर फाइवर के डंडे बरसाते थे। एनआईए आॅफिस लखनऊ में मुझे मानसिक रुप से लगातार प्रताड़ित किया गया। सादे पेपर पर साइन करवाया गया और कभी-कभी एक कागज पर लिखवाते थे कि प्रति प्राप्त किया। हालांकि मुझे कोई कागज नहीं दिया जाता था। 



एनआईए द्वारा बार-बार बुलाए जाने से मैं अपना करोबार ठीक से नहीं देख पाया और इसी बीच मेरी पत्नी प्रसव पीड़ा से कराहती रही और मैं मजबूरन एनआईए के कार्यालय जाता रहा। मुझे मनीष सोनकर ने रेल बाजार थाना कानपुर में बुलाकर कहा कि अगर तुम यह बयान नहीं दोगे कि तुम सैफुल्लाह और उसके साथ के लोगों से मिले हुए हो और तुमने इन लोगों का साथ दिया है तो तुम्हारी बीबी और उसके पेट में पल रहे बच्चे को मार दिया जाएगा। तुमको और तुम्हारे घर वालों को आतंकवाद में फंसा दिया जाएगा। एनआईए अफसरों ने मेरा फेसबुक एकाउंट और पासवर्ड दिनांक 18 मार्च 2017 को ले लिया है। कभी भी वे और उनका फोन आ जाता और वो लखनऊ आने को कहते, यहां आने के बाद मुझे घर लौटते-लौटते रात हो जाती थी। घर पहुंचने के बाद फिर से फोन आ जाता कि कल फिर आना है। मुझे कल 8795843266 से चन्द्रशेखर सिंह ने तो वहीं लगातार 9454409415 इंस्पेक्टर वीरेन्द्र वर्मा, 8317017598 इंस्पेक्टर चन्द्र शेखर सिंह, 05222391958 एनआईए आॅफिस से, 9444084799 चेन्नई से, 9412190977, 9454402324 मनीष सोनकर कानपुर एटीएस, 9140810979, 7786826623, 9331013397 कलकत्ता से, 8574164026, 7348108904, 7785006926, 9453330327 जावेद एटीएस लखनऊ के तमाम फोन आते रहे हैं जिससे मैं मानसिक रुप से बहुत परेशान हो गया हूं। मैंने 26 अपै्रल 2017 को माननीय मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय, माननीय मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय इलाहाबाद, गृह मंत्री भारत सरकार, उत्तर प्रदेश के डीजीपी और चेयरमैन मानवाधिकार आयोग भारत सरकार को प्रार्थना पत्र भेजकर सहायता की गुहार की है। इन दिनों मेरी 15 दिन पहले पैदा हुई बच्ची की तबीयत बहुत खराब है पर वो लोग हैं कि एक नहीं सुनते हैं। अंत में पीड़ित होकर मैंने एनआईए आॅफिस जाना मुनासिब नहीं समझा और बेहतर समझा कि अपनी पीड़ा आप लोगों के सामने रखूं। 

मोहम्मद आतिफ के भाई आकिब ने कहा कि 24 अपै्रल 2017 को लगभग 11 बजे दिन में मैं घर से निकला था कि रास्ते में महफूज नाम के एक साहब मिले जिन्होंने मुझसे मेरा मोबाइल सिम के साथ मांगा। न देने पर उन्होंने कहा कि हिट लिस्ट में सबसे ऊपर तुम्हारा नाम है। जावेद साहब लखनऊ और एसटीएफ के शर्मा जी को तुम्हारा नाम पहंुचा दिया गया है, जल्द तुम नपोगे।

Shoppersstop CPV

प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि किसी भी केस में विवेचक का कर्तव्य होता है कि वह तथ्यों को यथा रुप में इकट्ठा करके न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे। एक विवेचक का काम सत्यता का पता लगाना होता है न कि किसी अभियुक्त को सजा दिलाना। उसको सदैव पूर्व अवधारणा से ऊपर उठकर विवेचना करनी चाहिए न कि पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर पकड़े गए व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य बनाने का काम करना चाहिए। लेकिन इस समय जितने भी लोग पकड़े गए हैं उन सबको सजा दिलाने के लिए पूरी तरह से जांच और सुरक्षा के नाम पर ये एजेंसियां लोगों पर दबाव बनाकर झूठे साक्ष्य देने के लिए मजबूर कर रही हैं। गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का अधिकार है कि वह विवेचना में पूछताछ के दौरान अपनी पसन्द के अधिवक्ता से मिल सके लेकिन एनआईए के उस केस में जिसमें लखनऊ में सैफुल्लाह की हत्या हुई, न्यायालय ने आदेश दिया है कि विवेचना के दौरान अभियुक्तों के अधिवक्ता यदि चाहें तो दो सौ मीटर की दूरी से निगरानी रख सकते हैं। सवाल उठता है कि कानून कहता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अपनी पसन्द के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है किन्तु न्यायालय भी उसे इस अधिकार से वंचित कर देती है। इस कारण कहीं से भी न्याय की अपेक्षा मुश्किल होती जा रही है। 



रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि निश्चित तौर पर आतंकवाद के नाम पर अगर कोई भटकाव का शिकार है तो उसे सही रास्ते पर लाने की जरुरत है। लेकिन यह जरुरत एक खास समुदाय को चिन्हित कर जिस तरीके से की जा रही है और इसे डी-रेडिकलाइजेशन कहकर यूपी सरकार के घर वापसी का कार्यक्रम कहा गया उससे जाहिर है कि यह एक खास राजनीतिक विचारधारा के हेट कैंपेन ‘घर वापसी’ का ही यह हिस्सा है। पिछले दिनों अजमेर धमाकों पर संघ के लोगों को सजा सुनाई गई, मध्य प्रदेश में संघ से जुड़े आईएसआई के एजेंटों की गिरफ्तारी हुई, पूरे देश में गौवंश के नाम पर हिंसा बढ़ती गई और हालत इतनी बिगड़ी कि प्रधानमंत्री तक को बोलना पड़ा। ऐसे में क्या इस डि-रेडिकलाइजेशन या घर वापसी की जरुरत इन सांप्रदायिक हिंसा करने वालों के लिए नहीं है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को जिस तरह से धर्म से जोड़ा जा रहा है और उसका हल निकाला जा रहा है, यह संघ की राजनीति का हिस्सा है इसीलिए इसका नाम घर वापसी रखा गया है। राजीव ने कहा कि डि-रेडिकलाइजेशन की यह प्रक्रिया पिछले कुछ सालों में आईएस के नाम पर भटके युवाओं को लेकर चर्चा में आई है। लगातार सवाल उठता रहा है कि आखिर इन रेडिकलाइज करने वाली वेब साइटों को प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता वहीं सुरक्षा-जांच एजेंसियों पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह फर्जी वेब साइट बनाकर लोगों को फंसा रही हैं। देश में तमाम घटनाओं में सुरक्षा-जांच एजेंसियों और उनके एजेंटों की भूमिका सवाल के घेरे में रही है। 

Shoppersstop CPV

No comments:

Post a comment