Monday, 13 June 2016

तुम्हारे सहेरी के लिए गैरो को क्यों जगाते हो ?: दिलीप मंडल

एंड्रोइड के जमाने में 1948 वाले काम करते हो ?
चार किताब की तो योजना बन चुकी है. वैसे जिन लोगों को हजारों साल से नहीं लिखने दिया गया है, वे अब बहुत लिखने वाले हैं. छह शब्द की लिमिट वाला चोंचला उनके लिए नहीं है.

खाए - पीये - अघाए लोग लिखें छह शब्द की कहानी. फालतू के तमाशे से हेमिंग्वे नहीं बन पाओगे. नौटंकी कहीं के! क्या आधी रात में लाउड स्पीकर को 2 बजे 3 बजे ऑन करके पुरे मौहल्ले को जगा देना जरुरी है ? क्या सबके घर घड़ी नहीं है ? ऐंड्रोइड के जमाने में आप 1948 वाले काम करते हो ? दूसरे गैरो को तकलीफ देते हो

एक मोहल्ले में 5 मस्जिद और सबकी अपनी अपनी डफली और लाउड स्पीकर। सब के सब एक साथ स्पीकर बजा कर जगाते है। गलत है ये बहुत गलत हैं। छत पर चढ़ जाओ तो एक जगह पर खड़े होकर पांच अलग अलग सुर सुनाई देते है। शुक्र है कम से कम पुरानी दिल्ली जैसे इलाको में कभी यह बिमारी नही फैली। पर छोटे स्लम इलाके और गाँव-देहात में यह बड़ी प्रॉब्लम है। पुरानी दिल्ली में भी लाखो मुसलमान रहते है पर कभी भी मस्जिदों से 5/- और 10/- के लिए नाम ले लेकर लाउडस्पीकर पर नही चिल्लाते। सेहरी खत्म होने से पांच मिनट पहले बस इक बार इत्तल्ला दी जाती है और फिर सीधे अजान। रमजान आपके है आप जागो आप खाओ आप नींद से उठो दुसरो को आपके रमजान से क्या मतलब. सोने दो चैन से लोगो को

अब कोई ये न कहे के वो आरती करते है ...वो जागरण करते है। वो सुबह 5 बजे भजन करते है। अरे वो रातों को नाचे आप भी नाचोगे क्या ? रसूलल्लाह की तालीम आपके पास है उनके पास नहीं है इतना भी बताना पड़ेगा क्या ?....इस्लाम ये तो हरगिज नहीं सिखाता हमको आपको - दिलीप मंडल

हम मुसलमानों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना होगा. मुसलमान होकर भी मुसलमानों की गलतिया गैरमुस्लिम बुद्धिजीवी निकाल रहे है. और हमारे बुद्धिजीवी लोग बुद्धि को गिरवी रखे हुए है. यह बहुत ही शर्म की बात है. रमजान एक मुक़द्दस महीना है. बरकतों वाला महीना है. हम लोग 11 महीने पड़ोसियों को किसी भी तरह की तकलीफ नहीं देते. लेकिन पाक और बरकत वाले महीने में गैरमुस्लिमो को सोने नहीं देते. यह एक तकलीफ देने वाला ही काम है. एंड्रोइड के जमाने में. 
- संपादक

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