Tuesday, 7 June 2016

सोशल मीडिया पर छिड़ी फनी बहस "तशरीफ़"

सोशल मीडिया पर अक्सर कुछ न कुछ कहीं न कहीं खिचड़ी पकती ही रहती है, कभी हंसा कर लोटपोट करने वाली, कभी गमगीन करने वाली, कभी रुलाने वाली तो कभी झगड़ो वाली. लेकिन को पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक फनी बहस छिड़ी. जो सिर्फ एक शब्द को लेकर और वह शब्द है "तशरीफ़" ... आईये देखते है तशरीफ़ पर छिड़ी बहस की शुरुआत कैसे हुई....


आज पर्यावरण दिवस पर हमारे होस्टल वाले मित्र ने अपना अनुभव कुछ इस तरह बताया...
"पेड़ों का असली महत्व तब समझ आता है जब उसके नीचे खड़ी हुई बाइक पर बैठने से आपकी तशरीफ़ नही जलती".....

कुछ देर पहले की मेरी निम्नलिखित पोस्ट में "तशरीफ़" का शब्द पढ़ कर कुछ लोगों ने इनबॉक्स करके मिली जुली प्रतिकिर्या जताई...
"पेड़ों का असली महत्व तब समझ आता है जब उसके नीचे खड़ी हुई बाइक पर बैठने से आपकी तशरीफ़ नही जलती".....
वैसे अक्सर बातचीत के दौरान शब्द "तशरीफ़" सुनने में आता है...जैसे की अक्सर कहते हैं... "तशरीफ़ कहाँ जा रही है?" अब पूछने वाले कौन सी "तशरीफ़" की बात कर रहा है ज़रा सोचें, की "तशरीफ़" जा रही है या आ रही है भला आपसे क्या...
जैसे कभी इस तरह भी कि "आप अपनी "तशरीफ़" यहाँ रखिये"....अब यह किस "तशरीफ़" को रखने की बात करते हैं...
कभी इस तरह भी "ज़रा अपनी "तशरीफ़" कभी मेरे गरीब खाने पर पर ले कर आयें "..... अब इनसे पूछो भई मेरी "तशरीफ़" का आपने घर बुला कर क्या मुरब्बा डालना है?..
अक्सर यह भी सुनने को मिलता है "जनाब आपने "तशरीफ" ला कर मेरी जो इज्ज़तअफजाई की है उसका मैं कर्जदार रहूँगा"....अब इनको कौन बताये "तशरीफ़" मेरी और इज्ज़त इनकी कैसे इनकी बढ़ गई भला...
खैर दिमाग है शैतानी भी करता है...अगर आपकी "तशरीफ़" के साथ भी कभी कुछ इस तरह गुज़ारा हो तो ज़रूर लिखें....
वैसे यह वही "तशरीफ़" है जो धुप में बाइक पर अक्सर जलती है, सोचे ज़रा 

सभी दोस्तों को "रमादान करीम" या "रमजान की बहुत बहुत मुबारक"..
राजनेताओं का पसंदीदा महीना, टोपियाँ लगाओ और टोपियाँ पहनाओ कार्यक्रम के तहत हर शहर हर नुक्कड़ पर राजनेता टोपियाँ पहनते और पहनाते अपनी "तशरीफ़"* का टोकरा यहाँ से वहां उठाए घुमते नज़र आयेंगे.... रोज़ा हो ना हो लेकिन रोज़े जैसा मुंह बना कर अफ्तार के तम्बू में अपने आपको किसी वर्ग विशेष का सबसे बड़ा हिमायती जताने की होड़ लग जायगी... "इन जैसे" राजनेता रुपी सभी लोगों का इस जैसे तम्बू में स्वागत है... जय हो.... 
"तशरीफ़"* ..... बताने की ज़रुरत नहीं आप सबको पता है...

Devendra Singh अब इन मोहतरमा ने अपनी तशरीफ इनके उपर क्यों रखी है ? ये तो कोई भक्त ही बता सकता है ।

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