Sunday, 17 July 2016

मजलूमों ने मजलूमों और मजबूरो का साथ देना होगा माजुरो का नहीं

आज सभी बहुजन गुजरात के उन मजलूमों के लिए आवाज उठा रहे है जिनको मरी गाय की खाल निकालने पर गोरक्षा के नाम पर अमानुष पिटाई की गयी. यह घटना पिछले हफ्ते गुजरात में घटी. बताया जा रहा है की, पीड़ित चार युवक अनु जाती से है. और उच्च वर्नियो ने इनको शुद्र घोषित कर इनपर कहर बरसाया. इन चार मजलूम युवको को पहले लोहे की सरिया से पिटाई की, फिर एक कमरे में बंद कर पिटाई की, जालिम इसपर भी नहीं रुके तो कार के पीछे इन मजलूम युवको को बांधकर घसीटते हुए ले गए. इतनी अमानुष घटना को अंजाम देने वाले हैवानो को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए इस मांग को लेकर बहुजन समाज रास्ते पर उतर रहा है. और कई मुसलमान भी रास्ते पर उतरे है. बिलकुल वैसे ही जैसे रोहित वेमुला, जावखेडा हत्याकांड, अदि मजलूमों के लिए उतरे थे.



काफी मुसलमानों में यह नाराजी भी दिखाई दे रही है की, जब मजलूम मुसलमानों पर वक्त आता है तो कोई साथ नहीं देता जैसे दादरी के अखलाख कल भी अकेला था, आज भी अकेला है और कल भी अकेला रहेगा. लेकिन मुसलमानों को इस्लाम ने अनिवार्य किया है की हर उस मजलूम का साथ दे जो जालिमो के जुल्म का शिकार हो. इस्लाम ने यह अनिवार्य नहीं किया के तुम्हारा जो साथ दे उसका ही तुम्हे साथ देना चाहिए. लेकिन मुसलमानों को इस बात का जरुर ख़याल रखना चाहिए की वह सिर्फ मजलूमों और मजबूरो का साथ दे माजुरो का नहीं. कुछ माजुर लोग है जो अपनी कौम में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपने कौम के किसी नुमाईंदे पर कोई जुल्म होता है तो वह मुसलमानों को साथ लेकर उसके हाख की लड़ाई लड़ते है. हमें चाहिए की किसी नेता या किसी किबला के लिए नहीं बल्कि अल्लाह के हुक्म की तामिल के लिए मजलूमों का साथ देना होगा. किसीको नेता या प्रसिद्धि दिलाने के लिए नहीं. मुसलमान कौम निस्वार्थ होती है. और जो निस्वार्थी होता है उसे ही मुसलमान किया जाता है. निस्वार्थी मुसलमानों को किसी गिरोह की जरुरत नहीं होती. मुसलमान ही खुद अपने आप में एक संगठित इस्लाम है. 
- अहेमद कुरेशी
(उपरोक्त लेख किसी व्यक्ति, गिरोह, संगठन, या पार्टी की आलोचना करने के लिए नहीं है. किसी के विरोध से मेल खाता हो तो इसमें हम जिम्मेदार नहीं. महज एक अच्छा मेसेज दिया जाए इस मकसद से लिखा गया है)

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