Monday, 4 July 2016

सांप और गाय मारना मना है, आदमी मारिए - डॉ ओम सुधा

पिछले दिनों हमने हम सबने खबर सुनी की एक दलित को केवल इसलिए पीट पीट कर मार दिया क्योंकि उसके घर में एक विषैला सांप निकल आया था जिसे उसने मार दिया और पीटकर ह्त्या करने वालों का तर्क है सांप उनके लिए पूजनीय है। हाल के दिनों में गाय और गोमांस के मुद्दे पर भीड़ द्वारा पीट पीटकर ह्त्या कर देने की कई घटनाओं से देश गुजरा है। बनारस में मेढक और मेढ़की की शादी इसलिए करवाई गई क्योंकि कुछ लोगों का मानना है की इससे बारिश होगी। तेजस विमान की पहली उड़ान के पहले पण्डे द्वारा नारियल फोड़ने की तस्वीर को पूरे देश ने देखा । 

जिक्र किये गए तमाम घटनाओं में तेजस विमान की उड़ान के पहले नारियल फोड़ने वाली तस्वीर सबसे भयावह है। भयावह इसलिए क्यूंकि इसके लिए बकायदा सरकार ने पण्डे को दक्षिणा दिया होगा पूरा सरकारी अमला तस्वीर में पण्डे के सामने अदब की मुद्रा में खड़ा दीखता है। ये चिंताजनक है, हम सबको चिंता करनी चाहिए। और अगर हम चिंतित नहीं होते हैं तो हम भारतवासियों को खुद के बारे में चिंतन करना चाहिए। हम मंगल और चाँद पर बस्तियां बसाने के करीब गुजर रही दुनिया का हिस्सा है। आप सबने पढ़ा होगा जब यूरोप में पुनर्जागरण हो रहा था, नई दुनिया की तलाश हो रही थी, उस समय भारत में समंदर के पार जाने का मतलब धर्मभ्रष्ट होना था। उस समय भारत में सती प्रथा और बाल विवाह जैसी मान्यताएं थी। जाहिर है इन सबके पीछे वैदिक ग्रन्थ थे। जब दुनिया औद्योगीकरण से गुजर रही थी उस समय भारत वर्णव्यवस्था में बुरी तरह उलझी हुयी थी। पेरियार, ज्योतिबा फुले ने बड़ी समाजिक क्रान्ति के माध्यम से समतामूलक भारत की नींव राखी , जिसे बाद में डॉ आंबेडकर ने आगे बढ़ाया और समतामूलक समाज बनाने की लड़ाई आजतक अनवरत जारी है। वहीँ औरतों को दोयम दर्ज़ का नागरिक समझा जाता था सदियों से उसे ज्ञान से दूर रख गया था। इस साजिश को सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने नाकाम कर दिया और स्त्रियों के क्षितिज को विस्तार दिया । बाद में डॉ आंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से स्त्री को और अधिकारों से लैस करने की कोशिश की जिसे नाकाम कर दिया और विरोध स्वरुप डॉ आंबेडकर ने क़ानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। 

पर डॉ आंबेडकर के किये प्रयास व्यर्थ नहीं गए बल्कि राष्ट्रिय स्टार पर नवजागरण हुआ ।लोगों की चेतना दिनोदिन जागृत होने होने लगी । धर्म की सत्ता पर सवाल उठाना भारत में हमेशा से खतरे का काम रहा है । पर , ज्योतिबाफुले और पेरियार ने यह जोखिम उठाया । ज्योतिबा फुले की गुलामगिरी हिन्दू धर्म की सत्ता को चैलेन्ज करने वाला सबसे शानदार किताब है , जिसमे फुले ने बहुत तार्किक तरीके से हिन्दू धर्म की कुरीतियों का काफी तार्किक तरीके से खंडन किया है । आज भी धार्मिक अंधविस्वास पर सबसे करारी चोट करने वाली किताब गुलामगिरी ही है। 

बाद के दिनों में डॉ आंबेडकर ने गहन अध्ययन , तर्क और वैज्ञानिक चिंतन के आधार पर हिन्दू धर्म की तमाम बुराइयों पर कुठाराघात किया ।डॉ आंबेडकर की साहित्य ने भारतीय मानस की सोच पर बहुत ज़बरदस्त चोट किया। उनकी लेखनी और उनके भाषण ने इतना तो स्पष्ट हो गया की भारत में जाती पाती और वर्णव्यवस्था की जड़ें हिन्दू धर्म में गहरे पैबश्त हैं। डॉ। आंबेडकर ना केवल इस मुद्दे पर संघर्ष करते रहे बल्कि भारतीय संविधान की रूप में इसका समाधान भी कर दिया । भगत सिंह की मैं नास्तिक क्यों हूँ की चर्चा करना भी लाजिमी है ।

फुले से लेकर पेरियार और डॉ आंबेडकर को भी तत्कालीन समय में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था , उस समय भी सत्ता धर्म और उसकी मान्यताओं की खिलाफ नहीं जा सकती थी। बाद के दिनों में जब देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास हुआ तो इसमें कमी आई । पर हाल के दिनों में देशभर में धार्मिक उन्माद और अंधविस्वास से जुडी घटनाओं को हमे अलग नजरिये से देखना पडेगा। क्यूंकि अब इसको राजसत्ता का पोषण प्राप्त होने लगा है । ऐसा नहीं है की ऐसा पहली बार हो रहा है । पर, जबसे दक्षिणपंथी भाजपा सत्ता में आई है तब से यह कुछ ज्यादा ही हो रहा है की धार्मिक उन्माद या अंधविस्वास से जुडी घटनाओं को सत्ता का इतना ज़बरदस्त खुल समर्थन मिला हो । आप गौर करिये की देश में कहीं भी गौहत्या की वजह से कोई उन्मादी भीड़ किसी की पीट परतकार ह्त्या करता है है तो उन क्रूर उन्मादियों के समर्थन में भाजपा के किसी ना किसी नेता का बयान तुरंत आ जाता है। 

वर्णव्यवस्था के टूटने से जिस समुदाय का वर्चश्व टूट गया था , वो अचानक से सक्रीय हो गए हैं, देश भर में शोषण उत्पीड़न की घटनाओं में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुयी है । अगर आप आंखों को देखेंगे तो पाएंगे की भाजपा शाषित राज्यों में यह कुछ ज्यादा भी बढ़ा है। यहां तक की सरकार के कई मातृ दलितों को लेकर अभद्र टिप्पणी कर चुके हैं। वी के सिंह ने दलितों की तुलना कुत्ते से की थी, महारष्ट्र के भाजपा विधयक ने सूअर से दलितों की तुलना कर दी तो यूपी में भाजपा की एक महिला नेत्री मधु ने कहा की साफ़ सफाई करने वाले आज बराबरी कर रहे हैं। ना केवल दलित उत्पीड़न की घटनाओं से भजपा का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन है , बल्कि देशभर में नामदेव ढसाल से लेकर गोविन्द पंसारे समेत जितने भी लेखकों और बुद्धिजीवियों की हत्याएं हो रही है उसमे किसी न किसी तरह भाजपा कनेक्शन है। रोहित विमला का मुद्दा तो इस बातका ज्वलंत उदाहरण है की कैसे सत्ता दलितों को निगल रही है और सरकार उन शक्तियों के साथ कदमताल कर रही है। जिस बेशर्मी से स्मृति ईरानी मल्होत्रा और दत्तात्रेय ह्त्या की साजिश में परोक्ष रूप से भागीदार रहे उससे साफ़ पता चलता है की किस तरह राजसत्ता वर्णाश्रम व्यवस्था लौटाना चाहती है । असल में डॉ आंबेडकर के संविधान की वजह से समाज में बड़ा परिवर्तन हुआ । हाशिये का समाज कागज़ और कलम से जुड़ गया । आरक्षण की वजह से अवसर उपलब्ध होने लगे और हाशिये का पिछड़ा और दलित समाज अब समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगा है। जातियों का यह टूटन जातिवादियों को भारी पड़ रहा है। हाशिये का समाज मुख्य या पॉपुलर स्पेस में हस्तक्षेप करने लगा है। यही बात जातिवादियों को खटक रही है। जिस गति से हस्तक्षेप बढ़ रहा है उसी गति से उनकी तरफ से उन्माद फैलाने की डराने की कोशिश में लगे हैं। यह सीधे सीधे उनकी धर्म प्रदत्त सत्ता पर चोट है।।

आप देखिये की कैसे भाजपा के बड़े बड़े नेता समय समय पर हिंदुत्व का राग अलापते रहते हैं। भाजपा के पास हिंदुत्व के मुद्दे पर आग उगलने के लिए बकायदे एक समूह है जिसमे साध्वी प्रज्ञा , गिरिराज और आदितयनाथ जैसे लोग शामिल हैं और यह फेहरिस्त बहुत लम्बी है। 

अख़लाक़ के मसले हो या तेजस की उड़ान के वक़्त नारियल फोड़ने का मुद्दा हो चिंता की बात है। मैं आप पाठकों को इस सवाल के साथ छोड़ रहा हूँ की सोचियेगा की हमे वैज्ञानिक चिंतन और तार्किकता से लैस राष्ट्र बनना है या कूपमंडूक राष्ट्र ।।। सोचियेगा ।।क्यूंकि मरी हुयी सोच मरा हुआ नागरिक तैयार करती है।।।
नहीं सोचियेगा तो एक दिन हमे अपने देश के दरवाजे पर यह लिख कर टांग देना पडेगा की यहां गाय और सांप मारना मना है।। आदमी मारिए।। - यह लेखक के निजी विचार है....
Written by : डॉ ओम सुधा 
(नेशनल दस्तक से सभार)

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