Tuesday, 12 July 2016

यूपी चुनाव- गाय और दलित-मुस्लिम एकता : दिलीप मंडल

दिलीप मंडल एक बहुजन विचारक है. जो बहुजनो के लिए अपनी कलम चलाते है. इनके द्वारा दिए गए सुझाव मजलूमों के लिए एक लाभदायक मेसेज होता है. दलित और मुस्लिम एकता और यूपी चुनाव को देखते हुए उन्होंने अपने सोशल मीडिया फेसबुक की वाल पर अपने विचार व्यक्त किये है.


गाय और दलित-मुसलमान एकता!
गाय का चमड़ा छीलने का जातीय पेशागत काम करने वाले ये चारों युवक दलित हैं. पीटने वाले सवर्ण गुंडे हैं. तस्वीर गुजरात की है. हरियाणा के दुलीना में इसी अपराध में पांच दलितों की पीटकर हत्या कर दी गई थी.
सरकार बनने के बाद से RSS ने जब गाय की राजनीति शुरू की तभी मैंने लिखा था कि इसकी मार मुसलमानों पर कम और दलितों पर ज्यादा पड़ेगी.

आप घटनाओं को गिनकर देखिए. गाय की राजनीति में जितने मुसलमान अब तक मरे हैं, उससे तीन से चार गुना दलित मरे हैं.
दलितों का गाय से संबंध मरी गाय को ठिकाने लगाने, चमड़ा उतारने, चमड़ा पकाने, रंगने लेकर जूते तक का रहा है.
जानवरों की तरह पिटा गया इंसानों को

भारत में मरी हुई गाय दलितों का जिम्मा है. मरा जानवर खाना उनका शौक नहीं, सदियों से चली आ रही मजबूरी है. गाय का चमड़ा उतारना शास्त्र सम्मत पेशा बताया गया.
कहने को गाय जिनकी माता है, वे भी मरने के बाद अपनी मां का अंतिम संस्कार नहीं करते. अपनी मां को सड़ने के लिए फेंक देते हैं कि कोई दलित उसे ढोकर ले जाए.
गाय के नाम पर इंसान की हत्या करने वालों को इस बात की कहां परवाह कि उनकी लाखों गोमाताएं कचरा और प्लास्टिक खा रही हैं.

गाय की राजनीति दलितों और मुसलमानों को एकजुट करेगी. यह देश की लगभग 30% (17+13) आबादी है. इसमें ऊपर से आदिवासी तथा ईसाई भी जुड़ते हैं और ओबीसी का एक हिस्सा भी, जो ब्राह्मणवाद से तमाम और कारणों से त्रस्त है.

हद तो तब हुई जब सवर्णों ने दलितों को कार से बांधकर दौडाया
ध्यान रहे कि 31% वोट के बूते बीजेपी देश में बहुमत का राज चला रही है.
गाय की राजनीति ब्राह्मणवादियों को बहुत महंगी पड़ने वाली है. यूपी चुनाव पर नजर रखिए.
यूपी में दलित और मुसलमान का साझा आंकड़ा 40% के आसपास का है. यहां 35% से कम पर बहुमत की सरकार बन जाती है.
(उपरोक्त विचार लेखेक के निजी विचार है)

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